प्लास्टिक पृथ्वी के अस्तित्व के लिए खतरा

आज के वैज्ञानिक युग में न केवल मानव विकास बढ़ा है, बल्कि विज्ञान ने मानव जीवन को और भी सरल और सुविधाजनक बना दिया है। हालांकि नई तकनीक के इस्तेमाल ने कई बीमारियों, चुनौतियों और समस्याओं को भी जन्म दिया है। विज्ञान और आधुनिक तकनीकों के प्रयोग ने न केवल प्राकृतिक वातावरण को दूषित किया है बल्कि तकनीक के इस अंधाधुंध इस्तेमाल से धरती का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। इस संबंध में सबसे बड़ी समस्या यह बन रही है कि प्लास्टिक का अधिक से अधिक उपयोग और दैनिक जीवन में मानवीय वस्तुओं का उपयोग हो।

 

साथ ही मानव जीवन में लगभग सभी जगहों पर प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जा रहा है। बाजार में सामान खरीदने और बेचने के लिए पॉलीथिन के रूप में प्लास्टिक का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। जबकि विज्ञान के अनुसार प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जो जलने पर भी पूरी तरह नष्ट नहीं होता है। ऐसे में आम लोगों द्वारा ज्ञान के अभाव में इसका उपयोग करने के बाद इसे आम रास्तों, नालियों या खुली जगहों पर फेंकने से गंदगी होती है, पूरी तरह नष्ट नहीं होने के कारण वातावरण भी प्रदूषित हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार 100 साल तक प्लास्टिक नष्ट नहीं होता है। पॉलीथिन का उपयोग खाद्य सामग्री ले जाने में किया जाता है। जानवर इसे तब खाते हैं जब उन्हें बाहर फेंक दिया जाता है और उनके पेट में बरकरार रहता है। जो उनमें गंभीर बीमारियों को जन्म देता है।

 

इस बारे में राजस्थान में पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था के सदस्य सत्यनारायण योगी और गिरवर सिंह राजावत का कहना है कि पॉलीबैग के अत्यधिक उपयोग का मुख्य कारण सस्ता, हल्का और वाटरप्रूफ होना है। लोग इसमें कोई भी सामान आसानी से ले जाते हैं। यही वजह है कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में इसका खूब इस्तेमाल हो रहा है। लोग कपड़े, जूट और कागज से बने बैग की जगह पॉलीबैग का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। गिरवर सिंह राजावत के अनुसार पॉलीथिन पर्यावरण के लिए सस्ता और हल्का होने से कहीं ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि यह कभी नष्ट नहीं होता। अगर इसे मिट्टी में गाड़ दिया जाए तो इससे न सिर्फ जमीन की उर्वरक शक्ति समाप्त हो जाती है बल्कि पौधों को भी नुकसान पहुंचता है। यहां तक कि इसे जलाने से पूरे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। गिरवर सिंह कहते हैं कि अपनी जरा सी सुविधा और लालच के लिए इंसान न सिर्फ अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहा है बल्कि माहौल और पूरी सभ्यता के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है। पल्लेबैग के इस्तेमाल से पर्यावरण को लगातार नुकसान हो रहा है। लाखों पल्लीबैग का उपयोग कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों तक किया जाता है और फिर बिना किसी सुरक्षात्मक उपाय के खुले में फेंक दिया जाता है। इससे जहां नालियां और सीवर जाम हैं, वहीं कूड़ा उठाने के साथ जानवर भी मौत का शिकार हो रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह मिट्टी की उर्वरक क्षमता खो देता है।

 

जयपुर नगर निगम के उपायुक्त नवीन भारद्वाज के अनुसार जयपुर में रोजाना 1340 मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जिसमें अकेले 200 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। जिसे उचित प्रक्रिया के माध्यम से निपटाने का प्रयास किया जाता है, लेकिन अन्य कचरे की तुलना में प्लास्टिक को जल्दी नष्ट नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में लोगों को आगे आकर पर्यावरण में प्लास्टिक के प्रयोग को त्याग देना चाहिए। फिलहाल कोरोना की गंभीर हालत को देखते हुए जयपुर में 14 क्वार्टेनिन सेंटर बनाए गए हैं। जहां से मरीजों के इलाज के बाद जयपुर से 13 किमी दूर मथुरादास गांव में कचरे को प्लास्टिक कचरा फेंका जाता है। इससे वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है। इस वैश्विक समस्या से पार पाना नितांत आवश्यक हो गया है।

 

पॉलीथिन न केवल पर्यावरण को दूषित कर रही है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य का सबसे बड़ा दुश्मन भी साबित हो रहा है। लेकिन मनुष्य इससे अनजान है और जीवन के हर क्षेत्र में इसका उपयोग करता है। विशेषज्ञों के अनुसार गर्म खाद्य पदार्थों को बैग में रखकर खाद्य पदार्थों को भी पूरी तरह से केमिकल किया जाता है। जिसके प्रयोग से मनुष्य स्वयं बीमारियों से बच जाता है। प्लास्टिक के चश्मे में चाय या गर्म दूध के सेवन से लोगों के पेट में केमिकल आ जाता है। इससे डायरिया और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो रही हैं। इस बारे में पत्रकार गिरिराज प्रसाद का कहना है कि भारत में सालाना करीब 6 करोड़ टन कचरा निकलता है जिसमें 25940 टन प्लास्टिक कचरा होता है। करीब 50 फीसदी प्लास्टिक सिंगल यूज होता है। करीब 60 फीसदी की रिसाइक्लिंग नहीं हुई है। इनके अत्यधिक उपयोग का सबसे बड़ा कारण सस्ता और आसानी से उपलब्ध होना है। जबकि उपयोग यह भूल जाता है कि यह पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाता है।

 

सबसे बड़ी चिंता यह है कि महिलाओं के लिए बनाए जा रहे संतरी नैपकिन में भी प्लास्टिक का इस्तेमाल अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। इस बारे में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ अनुराधा कपूर और आनंदी शर्मा के मुताबिक नैपकिन बनाने में कॉटन के साथ-साथ प्लास्टिक और केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे यौन अंगों और बच्चों में संक्रमण का खतरा रहता है। देश के शहरी क्षेत्रों के 77% और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 40% महिलाएं मासिक धर्म के दौरान एक ही प्लास्टिक नैपकिन का उपयोग करके संक्रमित हो रही हैं। किशोर बालिका दित्ता शर्मा के अनुसार अधिकतर महिलाएं संतरी नैपकिन का सेवन करने के बाद उसे नष्ट करने के बजाय खुले में फेंक देते हैं। इससे संक्रमण का काफी खतरा होता है।

 

हालांकि केंद्र द्वारा देश को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए ठोस योजनाएं बनाई जा रही हैं। इसी कड़ी में 2022 तक देश को प्लास्टिक मुक्त बनाने का संकल्प लिया गया है। लेकिन कोई भी योजना धरातल पर तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि लोगों की पूर्ण भागीदारी न हो। हालांकि योजना में भागीदारी से ज्यादा समाधान करने और इसे शत प्रतिशत लागू करने की जरूरत है। अगर हम वास्तव में आने वाली पीढ़ी को नया भारत देना चाहते हैं तो हमें प्लास्टिक की गिरफ्तारी से बाहर आकर इसका त्याग करने की जरूरत है।

 

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