20 इंची औऱ 22 इंची

जालौन में बाराही देवी मेला के सामने हमारा परिवार किराये पर रहता था उस समय

मैं वहीं थोडी. दूर स्थित एक विद्यालय जो कक्षा 8 तक था उसमें में कक्षा 5 में पढ़ता

था उस समय उस विद्यालय ने स्कूल टोप करने बाले के लिए साइकिल इनाम में रखी

थी उस समय साइकिल का बडा ही महत्व था अपन पढ़ने में ठीकठाक थे तो टोप

कर लिया और स्कूल प्रबंधन द्वारा एक सांस्कृतिक प्रोग्राम का आयोजन कर उस समय

के सासंद बृजलाल खाबरी जी और उपजिलाअधिकारी जालौन उर्मिला सोनकर जी के

करकमलों द्वारा मुझे पुरूस्कार स्वरूप 20 इंची एटलस की साइकिल मिली अपन

फूल के कुप्पा ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया मिल गयी हो लेकिन दिक्कत ये थी

कि साइकिल चलानी आती नहीं थी तो शुरू में बडी शान से पैदल ही साइकिल को

सड़कों पर ढोते रहते थे, इतनी शान से चलते थे जैसे चौपर (हेलीकोप्टर) पैदल लिये

घूम रहे हों।

धीरे धीरे गिरते पड़ते साइकिल के बीच बाले हिस्से में पैर डालके साइकिल चलाना

सीखा हवा से बातें करती हुई साइकिल ऐसे भागती थी जैसे फरारी और उसको

चलाते हुऐ हम अंबानी कुछ समय बाद सीट पर बैठकर भी साइकिल चलाना सीख ही

गये!

जब कक्षा 7 में पहुँचा तो स्कूल भी बदल गया और हमारे परिवार का कमरा भी इस

बार हम कोतवाली के पास रहने लगे, 20 इंची साइकिल भी थी और साथ ही बडे.

भाई के लिए 22 इंची साइकिल भी आ चुकी थी मेरी नजर अब 20 इंची से 22 इंची

पर रहने लगी हालांकि ऊँची थी साइकिल एक बार सीट पर बैठने के बाद नीचे पाँव

आसानी से नहीं पहुंचते थे फिर भी चोरी छिपे साइकिल की चाबी लेकर हम टेस्ट

ड्राइव पे निकल जाते थे जिस दिन पकडे जाते थे उस दिन पिताजी के हाथों पेले

जाते थे।

ऐसे ही एक दिन 22 इंची साइकिल उठाई और स्टेट बैंक की तरफ चलते हुऐ पहली

गली छोड़ दूसरी गली में साइकिल मोड़ दी वो गली आगे जाकर दूसरे मैन रोड से

मिलती थी जैसे ही गली खत्म हुई और मोड़ आया अचानक से एक जवान आदमी

अपनी पत्नी को साइकिल पर बिठाकर निकला, हम साइकिल संभाल नहीं पाएं और

साइकिल के पीछे बाले हिस्से में ठोक दिये वो आदमी तो संभल गया पर उसकी पत्नी

सड़क पर गिर पड़ी., उन महाशय ने अपनी पत्नी को तो नहीं उठाया मेरी तरफ आँखे

लाल कर गुस्से में आग बबूला होकर मारने को बढे, अपन की सिट्टी पिट्टी गुम, डर

के मारे हाथ पैर सुन्न उसके हाथ उठाने से पहले अपन को कुछ नहीं सूझा और उसके

सामने कान पकड़कर खडे हो गये और "सौरी" बोलने लगे वो महाशय तो नहीं रूके

और गाली देते हुऐ हाथ उठाने ही बाले थे कि आस पास दुकानों में बैठे दुकानदार जो

ये सब देख रहे थे वो उस आदमी पर चिल्ला पडे. "अगर बच्चे पे हाथ उठाया तो

समझे रहना" एकदम से इतने लोगों का आक्रोश देखकर वो आदमी सहम गया और

अपनी पत्नी को उठाकर बाजार की ओर चलता बना।

गंगा कसम, पैदल ही साइकिल लेकर घर की ओर भागे, बार बार पीछे भी देखते जा

रहे थे कि कहीं महोदय लोट तो नहीं आऐ खैर घर पहुँचकर जान में जान आई, उस

दिन के डर की सिरहन आज भी याद है, ये अलग बात है उम्र बढ़ने के साथ डर खत्म

हो गया !!!

(सत्य घटना पर आधारित) #Reality #story #childhoodmemories

 

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